शहर बेज़ार रहगुज़र तन्हा

ज़िंदगी उठ चली किधर तन्हा

मेरी रग-रग में धूल रक़्साँ है
मुझ में मौजूद है खंडर तन्हा

दश्त की ना-तमाम राहों पर
कोई साथी है तो शजर तन्हा

तेरी आहट सजा के पलकों पर
ढूँढती है तुझे नज़र तन्हा

हो के बे-नूर रात कहलाई
चाँद को ढूँढती सहर तन्हा

संग भी दिल भी और ठोकर भी
'अर्श' तन्हा न ये सफ़र तन्हा

— Vijay Sharma

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