साँस तन्हाई से भरती ही चली जाती है
याद सीने में उतरती ही चली जाती है
पहले कमरे में बिखरती है अचानक इक दिन
फिर ये तन्हाई बिखरती ही चली जाती है
वो जो लड़की है न क़ुदरत का बदल लगती है
ग़ुस्सा करती है तो करती ही चली जाती है
— Vikram Gaur Vairagi
याद सीने में उतरती ही चली जाती है
पहले कमरे में बिखरती है अचानक इक दिन
फिर ये तन्हाई बिखरती ही चली जाती है
वो जो लड़की है न क़ुदरत का बदल लगती है
ग़ुस्सा करती है तो करती ही चली जाती है
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