हार के जब भी लौटा मैं घर को
मर ही जाएँ पटक के ये सर को
किस तरह अपने घर जा सके हम
किस तरह कम करें अपने डर को
बंद थी ये तेरी आँखें वरना
पोछता मैं तिरे चश्म-तर को
आज चश्में पहन कर मिले हम
धूप चुभती है ये दोपहर को
क्या नहीं हो सका है यहाँ पर
बस वे आते नहीं हैं इधर को
बंद कमरे में बैठा किसी दिन
देखता हूँ गुज़रते सहर को
जावेदानी नहीं ज़िंदगी ये
चाहते हैं किसी मुख़्तसर को
जो नहीं अब हमें कोई शिकवा
फ़र्क क्या पड़ गया बे- असर को
रह गए थे मिरे वादे वरना
हम नहीं आते अब इस नगर को
— Vishesh asthana















