ज़िंदगी इस तरह गुज़ारी हैजैसे सर से बला उतारी हैमुझ से मिल और मेरा क़र्ज़ चुकातुझ पे मेरी वफ़ा उधारी हैजो तेरे शहर की नदी है वोमेरे ही आँसुओं से जारी हैजैसा छोड़ा था तू ने वैसा ही हूँअपनी हालत नहीं सुधारी है— Viru Panwar Viyogi