किया है याद तुझे जब भी यार होली में
हुई है आँखें मेरी अश्क-बार होली में
चढ़ा है इश्क़ का जब से खु़मार होली में
तो दिल में बजने लगी है गिटार होली में
चलो कि अम्न के रंगों में रंग कर ख़ुद को
मिटा दे क़ल्ब का सारा ग़ुबार होली में
मैं तेरे हुस्न के रंगों से मात खा बैठा
शिकारी हो गया ख़ुद ही शिकार होली में
अब आ के रंग दे उल्फ़त के रंग में जानाँ
बहुत किया है तेरा इंतिज़ार होली में
तो मैं भी वस्ल के रंगों में खो गया 'साहिल'
किया है हिज्र ने जब बे-क़रार होली में
— Wajid Husain Sahil















