क्यूँ ख़ुद को तू रखता है यूँँ पत्थर सा बना कर
चल बज़्म में यारों की कभी हँस भी लिया कर
वो दिल न चुरा ले कहीं सीने से लगा कर
तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात रहा कर
तेरे सिवा कोई भी दिखाई न दे मुझको
या रब मिरी आँखों को सिफ़त ऐसी अता कर
वो शख़्स जो नज़रों से बहुत दूर है लेकिन
पहरो उसे तकता हूँ मैं ख़्वाबों में बुला कर
दिल से मिरी यादों का मिटाना तो अलग बात
नंबर ही मिरा फ़ोन से दिखला दे मिटा कर
साहिल जिसे कहते हैं तकी़ मीर भी भारी
देखूँगा किसी रोज़ वो पत्थर भी उठा कर
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