"बेबसी"
वक़्त के तेज़ गाम दरिया में
तू किसी मौज की तरह उभरी
आँखों आँखों में हो गई ओझल
और मैं एक बुलबुले की तरह
इसी दरिया के इक किनारे पर
नरकुलों के मुहीब झावे में
ऐसा उलझा कि ये भी भूल गया
बुलबुले की बिसात ही क्या थी
— Waseem Barelvi
वक़्त के तेज़ गाम दरिया में
तू किसी मौज की तरह उभरी
आँखों आँखों में हो गई ओझल
और मैं एक बुलबुले की तरह
इसी दरिया के इक किनारे पर
नरकुलों के मुहीब झावे में
ऐसा उलझा कि ये भी भूल गया
बुलबुले की बिसात ही क्या थी
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