रक्खा है दिल गुमान-भरा उस के पैरों में
और आ गया ये बाँकपना उस के पैरों में
क्या क्या हो सकता था ये मलामत भी रहती है
मैं ने बिताई रात ख़ुदा उस के पैरों में
फ़तवा निकल चुका है मेरे नाम का भी अब
क़लमा जो मैं ने बैठ पढ़ा उस के पैरों में
देखा जो हौसला कभी जंग-ए-हयात में
दुश्मन भी आके ख़ुद ही गिरा उस के पैरों में
सोचा था आज क़त्ल ही कर दें रक़ीब का
फिर ज़िंदा यूँ ही छोड़ दिया उस के पैरों में
तुम भेजते हो पहले फ़लक तक दुआ कोई
फिर आती है फ़लक से दुआ उस के पैरों में
राजा भी सोचे राज कुमारी ने देखा क्या
कासा भी टूटा फूटा पड़ा उस के पैरों में
— Anuj Vats















