"अकरबा परवारी"
हैरान था मैं और परेशान भी था मैं, कोई नहीं था जिसे ये समझाता था मैं
वो ख़ामोश रातो में ख़ुद से लड़ना,महफ़िल में ख़ुद को सालिम सा दिखाता था मैं
आज सब आ गए ग़लत और सही के फैसले की लड़ाई में,कैसे कह दू तुम सही और ग़लत मैं
कैसे समझाऊ ये जंग नहीं है कोई "अकरबा परवारी" की,ये जंग है उस बीमारी की
ये वो दर्द है जो हर किसी को अपनो से मिलता है, तुम समझ नहीं पाए या समझा पाया नहीं मैं
सब आज़ाद है सब भाग रहे, किसे फ़ुर्सत है यहाँ किसी के दर्द को समझने की
सबके अपने अपने "पैरों-निशा" है, सबके अपने अपने रंग है "मेहदी"
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