Rafiq Raaz

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Rafiq Raaz shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rafiq Raaz's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
सियाह दश्त की जानिब सफ़र दोबारा किया
न जाने क़ाफ़ की परियों ने क्या इशारा किया

न तेज़ ओ तुंद हवा से मिली नजात मुझे
न मैं ने सल्तनत-ए-ख़ाक से किनारा किया

फ़लक की सम्त निगाहें उठाने से पहले
ज़मीं के सारे मनाज़िर को पारा पारा किया

सियाह बन में चमकता हूँ मिस्ल-ए-दीदा-ए-शेर
ये किस ने ज़र्रा-ए-आवारा को सितारा किया

ख़ुमार-ए-ख़्वाब उतरने में थोड़ी देर लगी
फिर उस के बा'द बड़े शौक़ से नज़ारा किया

किसी ने मूँद के आँखों को फिर से खोल दिया
ये किस ने आप को दुनिया पे आश्कारा किया

हमारे होने के मंज़र की भी करामत देख
तुम्हारी चश्म को फ़व्वारा-ए-शरारा किया

नशे में नक़्शा रियासत ही का बिगाड़ दिया
ये क्या किया कि समरक़ंद को बुख़ारा किया
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Rafiq Raaz
इक फ़लक और ही सर पर तो बना सकते हैं
कुर्रा-ए-अर्ज़ को बेहतर तो बना सकते हैं

रूह में जिस ने ये दहशत सी मचा रक्खी है
उस की तस्वीर गुमाँ भर तो बना सकते हैं

अश्क से ख़ाक हुई तर यही बस काफ़ी है
एक बे-जान सा पैकर तो बना सकते हैं

हम अगर अहल नहीं पेड़ के फल खाने के
शाख़-ए-सरसब्ज़ को ख़ंजर तो बना सकते हैं

सच है हम गिर्या-कुनाँ कुछ भी नहीं कर सकते
रेगज़ारों को समुंदर तो बना सकते हैं

आतिश ओ नूर से बिजली के रहें क्यूँँ महरूम
हम सर-ए-दश्त नया घर तो बना सकते हैं

गरचे परवाज़ की क़ुव्वत नहीं ख़्वाहिश है बहुत
हम ख़यालात को शहपर तो बना सकते हैं

लाला-गूँ मंज़र-ए-शादाब सराबों में भी
क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ हो मुयस्सर तो बना सकते हैं
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सेहर कैसा ये नई रुत ने किया धरती पर
मुद्दतों बा'द कोई फूल खिला धरती पर

जाने इस कुर्रा-ए-तारीक में है नूर कहाँ
जाने किस आँख में है ख़्वाब तिरा धरती पर

आसमानों से ख़मोशी भी कभी नाज़िल कर
रोज़ करते हो नया हश्र बपा धरती पर

आसमानों में उलझते हो सियह अब्र से क्यूँँ
आ फ़क़ीरों की तरह ख़ाक उड़ा धरती पर

अब भी हिलता है मिरा नख़्ल-ए-बदन सर-ता-पा
अब भी चलती है हवसनाक हवा धरती पर

कोई आवाज़ कहीं से भी नहीं आती है
क़ाफ़-ता-क़ाफ़ है कैसा ये ख़ला धरती पर

अब भी वाबस्ता हैं उम्मीदें तुम्हीं से हम को
अब भी होती है तिरी हम्द ओ सना धरती पर

हिज्र की ज़र्द हवा यूँँही अगर चलती रहे
एक भी पेड़ रहेगा न हरा धरती पर
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मैं अभी इक बूँद हूँ पहले करो दरिया मुझे
फिर अगर चाहो करो वाबस्ता-ए-सहरा मुझे

फैलता ही जा रहा था मैं ख़मोशी की तरह
क़ुल्ज़ुम-ए-आवाज़ ने हर सम्त से घेरा मुझे

मेरे होने या न होने से उसे मतलब न था
तेरे होने का तमाशा ही लगी दुनिया मुझे

लोग कहते हैं किसी मंज़र का मैं भी रंग था
तू ने ऐ चश्म-ए-फ़लक उड़ते हुए देखा मुझे

आश्ना उस पार के मंज़र नहीं मुझ से मगर
जानता है धुँद की दीवार का साया मुझे

मैं कि सन्नाटों का मुबहम इस्तिआ'रा था कोई
दास्ताँ होता ज़माना शौक़ से सुनता मुझे

शुक्र है मैं इक सदा था ताइर-ए-मअ'नी न था
वर्ना वो तो ज़ेर-ए-दाम-ए-हर्फ़ ही रखता मुझे

मैं ही मैं हूँ और बदन के ग़ार में कोई नहीं
कर दिया तन्हा सगान-ए-दहर ने कितना मुझे
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जलता हुआ जो छोड़ गया ताक़ पर मुझे
देखा न इस ने लूट के पिछले पहर मुझे

वहशत से था नवाज़ना इतना अगर मुझे
सहरा दिया है क्यूँँ फ़क़त आफ़ाक़ भर मुझे

मैं गूँजता था हर्फ़ में ढलने से पेशतर
घेरा है अब सुकूत ने औराक़ पर मुझे

शाम-ओ-सहर की गर्दिशें भी देखनी तो हैं
अब चाक से उतार मिरे कूज़ा-गर मुझे

दरया-ए-मौज-खेज़ भी जिस पर सवार था
होना पड़ा सवार उसी नाव पर मुझे

मुझ में तड़प रहा है कोई चश्मा-ए-सुकूत
ज़र्ब-ए-असा से देख कभी तोड़ कर मुझे

पहुँचा किधर यहाँ न ज़मीं है न आसमाँ
अब कौन सी मसाफ़तें करनी हैं सर मुझे

थे गंज-ए-बे-क़यास तह-ए-क़ुल्ज़ुम-ए-वजूद
डूबा जो मैं तो मिल गए लाल-ओ-गुहर मुझे

जो ला सके न ताब ही मेरे जुनून की
इस दश्त-ए-कम-सवाद में दाख़िल न कर मुझे

शायद हटा है ग़ैब का पर्दा 'रफ़ीक़-राज़'
आता है नख़्ल-ए-आब पे शोअ'ला नज़र मुझे
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