दयार-ए-जिस्मसेसहरा-ए-जाँतक
उड़ूँमैंख़ाकसाआख़िरकहाँतक
कुछऐसाहमकोकरनाचाहिएअब
उतरआएज़मींपरआसमाँतक
बहुतकमफ़ासलाअबरहगयाहै
बिफरतीआँधियोंसेबादबाँतक
मुयस्सरआगहैगुलकीनबिजली
अंधेरेमेंपड़ेहैंआशियाँतक
येजंगलहैनिहायतहीपुर-असरार
क़दमरखतीनहींइसमेंख़िज़ाँतक
वहींतकक्यूँँरसाईहैहमारी
नुक़ूश-ए-पाज़मींपरहैंजहाँतक
निकलआओहिसार-ए-ख़ामुशीसे
जोदिलमेंहैवोलाओभीज़बाँतक
यहाँशैताँपहैइकलर्ज़ातारी
नहींउठताचराग़ोंसेधुआँतक