सुकूत टूट गया और रौशनी सी हुई
शरार संग से निकला ख़ुदा ख़ुदा कर के
खुला न दिन को किसी इस्म से वो आहनी दर
अब आओ देखते हैं रात को सदा कर के
उड़ूँगा ख़ाक सा पहले-पहल और आख़िर-ए-कार
हवा-ए-तुंद को रख दूँगा मैं सबा कर के
वो जिस के बोझ से ख़म भी न थी हमारी कमर
हम आज आए हैं वो क़र्ज़ भी अदा कर के
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इश्क़ की आतिश कहाँ बारूद के शो'ले हैं रक़्साँ
अब कहाँ वो ज़ुल्फ़ और वो दास्ताँ दार-ओ-रसन की
क्या हुए वो दिन कि जब अक्सर मुयस्सर थी मुझे भी
दिन को ज़ुल्मत ज़ुल्फ़ की और धूप शब को सीम-तन की
आतिश-ए-फ़ुर्क़त से मैं शब को उजाला माँगता हूँ इश्क़ में होती नहीं है हद कोई दीवाने-पन की
रौशनी जिस की मिरी आँखों को ख़ीरा कर चुकी है
राख कर के छोड़ देगी अब हरारत इस बदन की
देख के रस्ते के मंज़र सब के सब थे ग़र्क़-ए-हैरत
याद ऐसे में भला आती किसे अपने वतन की
Read Fullअब कहाँ वो ज़ुल्फ़ और वो दास्ताँ दार-ओ-रसन की
क्या हुए वो दिन कि जब अक्सर मुयस्सर थी मुझे भी
दिन को ज़ुल्मत ज़ुल्फ़ की और धूप शब को सीम-तन की
आतिश-ए-फ़ुर्क़त से मैं शब को उजाला माँगता हूँ इश्क़ में होती नहीं है हद कोई दीवाने-पन की
रौशनी जिस की मिरी आँखों को ख़ीरा कर चुकी है
राख कर के छोड़ देगी अब हरारत इस बदन की
देख के रस्ते के मंज़र सब के सब थे ग़र्क़-ए-हैरत
याद ऐसे में भला आती किसे अपने वतन की
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लफ़्ज़ गुम-सुम हैं और इन में है ग़म
मेरी ख़ामोशियों का जाह-ओ-जलाल
अक़्ल से कस्ब-ए-रौशनी कर के
मुल्क-ए-दिल हो गया है रू-ब-ज़वाल
तू भी उस में है तेरी दुनिया भी
कितना गहरा है सोच का पाताल
पक्की सड़कों पे याद आता है
कच्चे रस्तों का सब्ज़ा-ए-पामाल
किस पे अब है चिनार का साया
ईं जीरानिना-ओ-कैफ़ल-हाल
खोल दीवान-ए-हाफ़िज़-ए-शीराज़
फ़ाल तू अब रफ़ीक़-ए-राज़ निकाल
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मुझ से ख़ाली नहीं अब एक भी ज़र्रा है यहाँ
देख ये तंग ज़मीं और ये फैला हुआ मैं
देख कर वुसअत-ए-सहरा-ए-तपाँ लर्ज़ां हूँ
साहिल-ए-दीदा-ए-नमनाक पे ठहरा हुआ मैं
पा-ब-ज़ंजीर इधर तेज़ हुआ और उधर
ख़ाक के तख़्त पे सुलतान सा बैठा हुआ मैं
कोई ख़ुर्शीद सा दुनिया पे चमकता हुआ तू
किसी दीवार से साया सा निकलता हुआ मैं
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दयार-ए-जिस्म से सहरा-ए-जाँ तक
उड़ूँ मैं ख़ाक सा आख़िर कहाँ तक
उड़ूँ मैं ख़ाक सा आख़िर कहाँ तक
कुछ ऐसा हम को करना चाहिए अब
उतर आए ज़मीं पर आसमाँ तक
बहुत कम फ़ासला अब रह गया है
बिफरती आँधियों से बादबाँ तक
मुयस्सर आग है गुल की न बिजली
अंधेरे में पड़े हैं आशियाँ तक
ये जंगल है निहायत ही पुर-असरार
क़दम रखती नहीं इस में ख़िज़ाँ तक
वहीं तक क्यूँ रसाई है हमारी
नुक़ूश-ए-पा ज़मीं पर हैं जहाँ तक
निकल आओ हिसार-ए-ख़ामुशी से
जो दिल में है वो लाओ भी ज़बाँ तक
यहाँ शैताँ प है इक लर्ज़ा तारी
नहीं उठता चराग़ों से धुआँ तक
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हस्सास हूँ और इस पे वो शिद्दत की प्यास है
सुनता हूँ अब सराब में पानी का शोर भी
ऐसा सुकूत था कि सुनाई दिया मुझे
हर्फ़-ए-तही में मौज-ए-मआनी का शोर भी
बे-बर्ग-ओ-बार पेड़ से रहते हैं दूर दूर
रह-गीर भी हवा-ए-ख़िज़ानी का शोर भी
ख़ाकिस्तर-ए-बदन में सुलगती है कोई चीज़
बुझता नहीं अभी ये जवानी का शोर भी
तेरी ग़ज़ल पढ़ी तो ये जाना 'रफ़ीक़'-राज़
पानी के शोर में है रवानी का शोर भी
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पैदा किया है उड़ती हुई ख़ाक से मुझे
निस्बत यही है सरसर-ए-सफ़्फ़ाक से मुझे
निस्बत यही है सरसर-ए-सफ़्फ़ाक से मुझे
अब तो असीर-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार हूँ
मुद्दत हुई है उतरे हुए चाक से मुझे
आएगा कोई खोलेगा बंद-ए-क़बा-ए-हर्फ़
देगा नजात काग़ज़ी पोशाक से मुझे
दुनिया है इश्वा-साज़ तो मैं हूँ मकीन-ए-ज़ात
ख़तरा नहीं है इस ज़न-ए-बेबाक से मुझे
पर फड़फड़ा रहा हूँ बसीरत के दाम में
कोई छुड़ाए कब्ज़ा-ए-इदराक से मुझे
रह जाएगी लकीर लहू की ज़मीन पर
ले जाइए न बाँध के फ़ितराक से मुझे
मुझ से ज़मीन ख़ौफ़-ज़दा है 'रफ़ीक़-राज़'
ये जानती है रब्त है अफ़्लाक से मुझे
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साँप सा लेटा हुआ सुनसान रस्ता सामने था
ख़तरा आग़ाज़-ए-सफ़र में एक ऐसा सामने था
ख़तरा आग़ाज़-ए-सफ़र में एक ऐसा सामने था
दश्त में घमासान का वो रन पड़ा था कुछ न पूछो
धूप मेरी पुश्त पर थी और साया सामने था
अब तो उन आँखों के आगे आईना है और मैं हूँ
हाए मिज़्गाँ खोलने से पहले क्या क्या सामने था
बुज़दिल ऐसे थे भिगो पाए न अपने हाथ तक हम
दोनों बाज़ू थे सलामत और दरिया सामने था
मैं मसाफ़त की तरह था बीच में सिमटा हुआ सा
पुश्त की जानिब समुंदर और सहरा सामने था
वस्ल के ख़्वाबों में अब वो रौशनी बाक़ी नहीं थी
हिज्र की रातों में सोने का नतीजा सामने था
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चाँदनी रात में इक बार उसे देखा था
चाँद से बर-सर-ए-पैकार उसे देखा था
चाँद से बर-सर-ए-पैकार उसे देखा था
मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद नुमूदार वो अब तक न हुआ
आख़िरी बार सर-ए-ग़ार उसे देखा था
मैं भला कैसे बयाँ करता सरापा उस का
शब-ए-यलदा पस-ए-दीवार उसे देखा था
दिल में उतरी ही न थी रौशनी उस मंज़र की
अव्वलीं बार तो बेकार उसे देखा था
लोग क्यूँ कोह ओ बयाबाँ में उसे ढूँडते हैं
मैं ने तो बर-सर-ए-बाज़ार उसे देखा था
उस ने क्या रात को देखा था ये मालूम नहीं
मैं ने तो नक़्श-ब-दीवार उसे देखा था
उस की आँखों में चमक ख़्वाब की ये कैसी है
रात भर चर्ख़ ने बेदार उसे देखा था
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लाऊँगा अब कहाँ से नज़ारे की ताब मैं
उस ने तो मेरी आँख से पर्दे हटा दिए
बाग़-ए-हुरूफ़-ओ-गुलशन-ए-मा'नी में देखना
किस ने ये ख़ामुशी के नए गुल खिला दिए
छोटे से अब्र पारे ने आ के सर-ए-फ़लक
अहल-ए-नज़र को दिन ढले पैग़ाम क्या दिए
बस हम तो एक छोटी सी ज़िद पे अड़े रहे
दस्तार को बचाने में सर ही कटा दिए
आँखों में रह गए हैं फ़क़त आस के सराब
दरिया वो यास के थे जो उन में बहा दिए
दिन को सफ़र कुछ और भी आसान हो गया
रातों को सब्ज़ ख़्वाब ये किस ने दिखा दिए
तरतीब से लिए हैं तुम्हारे तमाम नाम
इक और ही फ़लक पे सितारे सजा दिए
तूफ़ाँ का रूप धार लिया तेज़ साँस ने
इतना कि ख़्वाब-गाह के पर्दे हिला दिए
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