Saba Afghani

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Saba Afghani shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saba Afghani's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ऐ दोस्त जुदाई में तेरी कुछ ऐसे भी लम्हे आते हैंसजों पे भी तड़पा करता हूँ काँटों पे भी राहत होती है — Saba Afghani
तेरे हसीन तसव्वुर को सामने ला कर शब-ए-फ़िराक़ को बख़्शी है चाँदनी मैं ने — Saba Afghani

Ghazal

गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है हर शाम-ओ-सहर क़ुर्बां जिस पर दुनिया-ए-मसर्रत होती है वो पैकर-ए-राहत क्या जाने कैसी शब-ए-फ़ुर्क़त होती है ऐ वाइज़-ए-नादाँ करता है तू एक क़यामत का चर्चा याँ रोज़ निगाहें मिलती हैं याँ रोज़ क़यामत होती है करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँ से ऐ नादाँ तौहीन-ए-मोहब्बत होती है वो पुर्सिश-ए-ग़म को आए हैं कुछ कह न सकूँ चुप रह न सकूँ ख़ामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है ऐ दोस्त जुदाई में तेरी कुछ ऐसे भी लम्हे आते हैंसजों पे भी तड़पा करता हूँ काँटों पे भी राहत होती है जो आ के रुके दामन पे 'सबा' वो अश्क नहीं है पानी है जो अश्क न छलके आँखों से उस अश्क की क़ीमत होती है — Saba Afghani
राज़ है बहुत गहरा बात इक ज़रा सी है वो मैं सामने फिर भी चश्म-ए-शौक़ प्यासी है ज़िंदगी भी बरहम है मौत भी ख़फ़ा सी है आज-कल तो दोनों में आप की उदासी है अपनी अंजुमन से हम ये कहाँ चले आए हर तरफ़ अँधेरा है हर तरफ़ उदासी है दाग़-ए-दिल को रौशन कर ग़म की रात है लंबी शम्अ' का भरोसा क्या मह भी बे-वफ़ा सी है आप हज़रत-ए-वाइज़ पहले ख़ुद को पहचानें क्यूँँकि ख़ुद-शनासी ही वज्ह-ए-हक़-शनासी है जाम इस लिए अपना आँसुओं से भरता हूँ जिस नज़र से पीता था आज वो भी प्यासी है यूँँ तो हिज्र की रातें रोज़ ही गुज़रती हैं आज ऐ 'सबा' लेकिन सुब्ह से उदासी है — Saba Afghani
कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं राह में भी कोई शम्अ' जलती नहीं आसमाँ पर भी कोई सितारा नहीं ये बहार-ओ-ख़िज़ाँ ये ख़ुशी और ग़म ये हसीं नाज़नीं दिल के पत्थर सनम सब सहारे हैं बस चार दिन के लिए ज़िंदगी-भर का कोई सहारा नहीं मेरी ग़ैरत मिरी आन का इम्तिहाँ तेरी साज़िश पे भारी है ऐ बाग़बाँ जान दे दूँ अभी ये तो मंज़ूर है गुलिस्ताँ छोड़ दूँ ये गवारा नहीं घट गई या तो ज़ौक़-ए-सफ़र की लगन बढ़ गई या नई लग़्ज़िशों से थकन कोई तो बात है जो सर-ए-रह-गुज़र आज मंज़िल ने हम को पुकारा नहीं तुम हो मुख़्तार ये दिल की आवाज़ है आख़िर इस बात में कौन सा राज़ है जिस को निस्बत तुम्हारे ही दर से रही वो मुक़द्दर भी तुम ने सँवारा नहीं इस से बढ़ कर कोई और कैसे जिए उम्र-भर हम ने इक बे-वफ़ा के लिए कौन सी रात आँखों में काटी नहीं कौन सा दिन तड़प कर गुज़ारा नहीं रास आए जिसे उस को आसान है इश्क़ की वर्ना हर मौज तूफ़ान है ऐ 'सबा' एक दरिया है ये आग का वो भी ऐसा कि जिस का किनारा नहीं — Saba Afghani
होश-ओ-ख़िरद से दूर हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ से दूर दीवाना हूँ क़ुयूद-ए-रुसूम-ए-जहाँ से दूर हद्द-ए-नज़र से दूर ज़मान-ओ-मकाँ से दूर मंज़िल है मेरे इश्क़ की फ़हम-ओ-गुमाँ से दूर रंगीनी-ए-जमाल से सहरा भी है चमन बैठा हूँ गुल्सिताँ में मगर गुल्सिताँ से दूर ये बे-ख़ुदी-ए-शौक़ का आलम तो देखिए सज्दे तो कर रहा हूँ मगर आस्ताँ से दूर दिल भी वही है मैं भी वही दर्द भी वही लेकिन ये क्या कि लज़्ज़त-ए-सोज़-ए-निहाँ से दूर शायद उसी का नाम है नाकामी-ए-मुराद मंज़िल से हूँ क़रीब मगर कारवाँ से दूर अफ़्साना-ए-हयात को समझो तो ऐ 'सबा' हर हर्फ़ दास्ताँ है मगर दास्ताँ से दूर — Saba Afghani
सामने उन को पाया तो हम खो गए आज फिर हसरत-ए-गुफ़्तुगू रह गई उन से कहना था रूदाद-ए-शाम-ए-अलम दिल की दिल ही में ये आरज़ू रह गई ग़म के साँचे में इक इक नफ़स ढल गया उन की महफ़िल में ये दौर भी चल गया अश्क पीने से माना कि दिल जल गया ज़ब्त-ए-ग़म की मगर आबरू रह गई तेरे नक़्श-ए-क़दम भी मिले जा-ब-जा तेरी महफ़िल तिरा आस्ताँ भी मिला हाँ मगर तू किसी को नहीं मिल सका हो के नाकाम हर जुस्तुजू रह गई दिल में दाग़ों का जब से है इक गुलिस्ताँ छिन गई हैं बहारों से रंगीनियाँ अब गुलों में वो पहली सी निकहत कहाँ आरज़ी रौनक़-ए-रंग-ओ-बू रह गई नाज़ था हम को जिन पर उन्हीं की क़सम वो भी उल्फ़त में निकले न साबित-क़दम बे-कसी के अँधेरे में ऐ शाम-ए-ग़म एक हम रह गए एक तू रह गई अल्लाह अल्लाह तिरे हुस्न की इक झलक रौशनी हो गई अज़-ज़मीं-ता-फ़लक एक बिजली सी लहराई कुछ दूर तक फिर ठहर कर मिरे रू-ब-रू रह गई आँख से आँख और दिल से दिल जब मिला जाने उन की निगाहों ने क्या कर दिया मेरी आँखों में उस रोज़ से ऐ 'सबा' खिंच के तस्वीर-ए-जाम-ओ-सुबू रह गई — Saba Afghani