ख़ुदा हिस्सों में किसने बाँटी ज़मीं
तू महदूद कर दे सरकती ज़मीं
ज़मीं इश्क़ करती है महताब से
अमावस की शब में तड़पती ज़मीं
कभी चाँद मिलने को आता है पास
कभी चाँद के पास जाती ज़मीं
नहीं सोचता कोई उनके लिए
किसानों को बहला के लूटी ज़मीं
बहुत ऊँची है ये इमारत सुनो
खड़ी है जहाँ पे है किसकी ज़मीं
ज़मीं दिल की जबसे हुई रेगज़ार
बहारों के बिन अब मचलती ज़मीं
सनम बेवफ़ाई का है ये सबब
हिला दी है तुमने तो मेरी ज़मीं
Read Full