ख़ुदा हिस्सों में किस ने बाँटी ज़मीं
तू महदूद कर दे सरकती ज़मीं
ज़मीं इश्क़ करती है महताब से
अमावस की शब में तड़पती ज़मीं
कभी चाँद मिलने को आता है पास
कभी चाँद के पास जाती ज़मीं
नहीं सोचता कोई उन के लिए
किसानों को बहला के लूटी ज़मीं
बहुत ऊँची है ये इमारत सुनो
खड़ी है जहाँ पे है किस की ज़मीं
ज़मीं दिल की जबसे हुई रेगज़ार
बहारों के बिन अब मचलती ज़मीं
सनम बेवफ़ाई का है ये सबब
हिला दी है तुम ने तो मेरी ज़मीं
— Manish Kumar Gupta















