वो चली गई
वो चटाख़ चिड़िया चली गई
मिरे आशियाँ में गुज़शता शब वो रुकी
मगर दम-ए-सुब्ह फिर से वो उड़ गई
उसे उड़ते रहना पसंद था सो चली गई
बड़ी शोख़ थी बड़ी तेज़-रौ
बड़ा चहचहाती थी मुस्कुराती थी
उस के पंखों में कोई दाम-ए-विसाल था
मुझे उस का नाम पता नहीं
वो कहाँ से आई नहीं ख़बर
वो यहीं कहीं पे छुपी हुई तो नहीं यहीं
किसी और आँख को दाम-ए-हुस्न में बाँध कर
दिल-ए-मुब्तला को असीर-ए-वस्ल किए हुए
वो नहीं गई वो यहीं कहीं तो ज़रूर है
— Yahya Khan Yusuf Zai















