मुझे वो ग़म है कि सारी ज़मीन रोने लगे
जो अश्क पोंछ दूँ तो आस्तीन रोने लगे
तुम्हें पता है मैं ऐसी जगह भी हँस आया
जहाँ पे ज़ब्त के सब माहिरीन रोने लगे
मदारी जानता था आख़िरी तमाशा है
सो खेल ऐसा किया नाज़िरीन रोने लगे
तिरे लबों पे उदासी थी एक लम्हे को
तिरी हँसी के सभी शाएक़ीन रोने लगे
कुछ ऐसे क़ैद किया है घरों में क़ुदरत ने
मकान हँसने लगे और मकीन रोने लगे
— Yasir Khan















