us ke haathon men vo taaseer-e-masihaai thii | उस के हाथों में वो तासीर-ए-मसीहाई थी

  - Yasir Khan

उस के हाथों में वो तासीर-ए-मसीहाई थी
सूखते पेड़ से भी शाख़ निकल आई थी

ज़िंदगी भर वो उदासी के लिए काफ़ी है
एक तस्वीर जो हँसते हुए खिंचवाई थी

कल तो मरने में सुहूलत भी बहुत थी मुझ को
हिज्र था रात थी बरसात थी तन्हाई थी

मर गया प्यास से वो शख़्स भी अब हैरत है
जिस की दरियाओं से बरसों की शनासाई थी

देख लेने की सुहूलत तो सभी को थी मगर
चंद ही आँखें थीं जिन आँखों में बीनाई थी

  - Yasir Khan

Raat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Yasir Khan

As you were reading Shayari by Yasir Khan

Similar Writers

our suggestion based on Yasir Khan

Similar Moods

As you were reading Raat Shayari Shayari