ये मौसम है उमंगों का तरंगों का ज़माना है

चमन के फूल हैं हम काम अपना मुस्कुराना है
क़दम जो भी उठाना है तरक़्क़ी का उठाना है
सितारों की तरह इक दिन फ़लक पर जगमगाना है
गले में डाल कर बाँहें ख़ुशी के गीत गाना है
हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है
मिले आधी अगर रोटी तो हम उतनी ही खाएँगे
मुसीबत जो पड़े सर पर ख़ुशी से झेल जाएँगे
जो पढ़ना सीख जाएँगे तो औरों को पढ़ाएँगे
जो रस्ते में भटकते हैं उन्हें मंज़िल दिखाएँगे
मोहब्बत का दिया हर मोड़ पर हम को जलाना है
हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है
नहीं है इल्म से बढ़ कर जहाँ में कोई भी दौलत
यही है नूर आँखों का दिलों की है यही राहत
ये वो शय है लगा सकता नहीं जिस की कोई क़ीमत
बग़ैर इस के न मिल पाएगी दुनिया में कोई इज़्ज़त
उठो जल्दी अगर ता'लीम का दरिया बहाना है
हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है
जहालत का अँधेरा अक़्ल से मा'ज़ूर करता है
जो दिल की आँख है उस को यही बे-नूर करता है
बना देता है ये शैताँ ख़ुदा से दूर करता है
हमें दर दर भटकने के लिए मजबूर करता है
जिसे ता'लीम कहते हैं कि वो हिकमत का ख़ज़ाना है
हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है

— Zafar Kamali

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