मुझे क्या ख़बर थी

कि तुम मेरी उँगली पकड़ कर चलोगी
शब की तारीक सरहद से
बाहर निकलते ही
दिन के उजाले में
पहला क़दम रखते ही
मुस्कुरा कर कहोगी
देखिए शुक्रिया
अब यहाँ से मैं
सूरज की किरनों के हमराह
ख़ुद ही चली जाऊँगी
और मैं
मुड़ के देखूँगा उन रास्तों को
जो यूँ शब-ज़दा हो चुके हों
कि अपना पता खो चुके हों

— Zafar Zaidi

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