देख कर रोते हुए बच्चों को फुसला भी दिया कर
अशरफ़-उल-मख़्लूक़ है तू काम अच्छे कर लिया कर
मत किया कर दूसरों के सामने ग़म की नुमाइश
ज़ख़्म गहरे हैं बहुत तो उन की तुरपाई किया कर
ये समुंदर भी समुंदर हैं नदी नालों से यारों
यार ख़ुद ही को हमेशा तू तवज्जोह मत दिया कर
जानता हूँ मैं कि मैं तुझ को मुसलसल छेड़ता हूँ
तू उठा आवाज़, लड़ने की कभी कोशिश किया कर
लाख अपने मन की कर पर बात इतनी मान मेरी
जब ज़रूरत दोस्त की हो तब ज़बाँ को मत सिया कर
— Tarun Pandey















