यहाँ सबको पता है जो वो बस आधी कहानी है
हक़ीक़त को छुपाने की मिरी आदत पुरानी है
जो ज़ेर-ए-आसमाँ रहते हैं ख़ुद को क्या समझते हैं
वे कठपुतली हैं जिनको बस अदाकारी निभानी है
ग़म-ए-हिज्राँ में वो लड़के लटक जाते हैं रस्सी से
जिन्हें सारी परेशानी अकेले ही उठानी है
मिरी इक दोस्त कहती है कि मुझको भूल जाना तुम
कहानी इक दिल-ए-बर्बाद की उसको छुपानी है
अरे शागिर्द मेरा हो कि तेरा हो, रहे मिल कर
हमें बच्चों के ख़ातिर प्यार की दुनिया बसानी है
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