इसी ख़ुशी ने मेरा दम निकाल रक्खा है
कि उस ने अब भी मेरा ग़म सँभाल रक्खा है
मैं ख़ाक ही तो हूँ आख़िर मेरा बनेगा क्या
मुझे कुम्हार ने चक्कर में डाल रक्खा है
और मेरे ख़िलाफ़ मिले है कई सुबूत मगर
मेरे वकील ने जज को सँभाल रक्खा है
— Zubair Ali Tabish
कि उस ने अब भी मेरा ग़म सँभाल रक्खा है
मैं ख़ाक ही तो हूँ आख़िर मेरा बनेगा क्या
मुझे कुम्हार ने चक्कर में डाल रक्खा है
और मेरे ख़िलाफ़ मिले है कई सुबूत मगर
मेरे वकील ने जज को सँभाल रक्खा है
Other ghazal from the same pen
Shers of jashn shayari collection.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling