apang ko haan jaise apni hi shareer bojh hai | अपंग को हाँ जैसे अपनी ही शरीर बोझ है

  - 100rav

अपंग को हाँ जैसे अपनी ही शरीर बोझ है
तेरे न मिलने से ये 'इश्क़ की लकीर बोझ है

ख़ुदा ने सोच क्या यूँँ ही हमें क़रीब लाया था
तुझे नहीं समझना तो तेरा ज़मीर बोझ है

ये लिखना भी फ़ुज़ूल है रक़ीब के मुक़ाबले
शिकस्तगी को जैसे खेल में वज़ीर बोझ है

वो उसका ही है फिर भी मुझ सेे बैर है रक़ीब को
जहाँ मिले तो भी अमीर को फ़क़ीर बोझ है

मैं कच्चा मानता था ख़ुदकुशी से मरने वालों को
बिना तेरे ये ऐसे जीना जू-ए-शीर बोझ है

  - 100rav

Greed Shayari

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