100rav
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Ghazal

भला क्या ही चला जाता तुम्हारा

मुझी से होता जो रोका तुम्हारा

तुम्हें ससुराल घर से भेजते जो
मेरे घर तक सफ़र होता तुम्हारा

कोई संदूक़ घर में खोलता तो
वो पाता शादी का जोड़ा तुम्हारा

सिलेंडर बैग राशन नाज़ के बा'द
उठाता सर पे मैं बच्चा तुम्हारा

मेरी माँ गाँव जाती जब कभी तो
हाँ घर में चलता बस सिक्का तुम्हारा

नहीं लिखना था कुछ भी तुम पे लेकिन
सभी को सुनना है क़िस्सा तुम्हारा

मैं कर लूँ ख़ुद-कुशी भी आज ही पर
जलेगा मुझ
में फिर हिस्सा तुम्हारा

तुम्हें चाहा था हम दोनों ने फिर क्यूँ
मिला सौरभ को बस धोका तुम्हारा

— 100rav

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