100rav
100rav
Ghazal

किसी इक दिन नहीं हर पल नहीं होता

हाँ उस की आँख में काजल नहीं होता

सँवरती तो नहीं पर हूर जैसी है
मैं ऐसे ही कभी पागल नहीं होता

हमारी दोस्ती से चिढ़ने वाले सुन
कँवल के पास क्या दलदल नहीं होता

दिखा था बाल उस के आँख के नीचे
हटा देता मगर कस-बल नहीं होता

हुई है उस की अब आकाश से यारी
समा में ग़म का अब बादल नहीं होता

मिलाती हाथ है सब से सिवा मेरे
तभी दिन दीन का मख़मल नहीं होता

— 100rav

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