ये तुझे अब देखने की कैसी आदत हो रही है
क्या मुहब्बत को मुहब्बत से मुहब्बत हो रही है
पूछा उसने साड़ी या फिर ड्रेस किस
में जँचती हूँ मैं
अब क़यामत से क़यामत पे क़यामत हो रही है
छुट्टी कर लूँ मैं कभी कॉलेज में तो ढूँढती है
क्या ज़रूरत को ज़रूरत की ज़रूरत हो रही है
जबसे उसका माथा चूमा है तभी से ज़िंदगी ये
ख़ूबसूरत ख़ूबसूरत ख़ूबसूरत हो रही है
जब अकेला पाती है बाँहों में भर लेती है छुपकर
ज़िंदगी अब उसकी रहमत में हाँ जन्नत हो रही है
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