अगर जो हिज्र को मेरी तरह काटा करोगे तुम

बहुत उम्दा करोगे तुम बहुत आला करोगे तुम

तरस जो मुझ पे खाओगे तो फिर अच्छा नहीं होगा
तरस खाकर तो मुझ पे वक़्त को ज़ाया' करोगे तुम

अगर होगे कभी तन्हा तो फिर तुम बैठ कर यारा
यक़ीनन मुझ को ही बस मुझ को ही सोचा करोगे तुम

चलो माना लड़ाई करने से गर प्यार बढ़ता है
तो अब हर बात पे क्या इस तरह झगड़ा करोगे तुम

तरस खाया नहीं तुम ने मुझे करते हुए तन्हा
तो लिख लो देखने तक को मुझे तरसा करोगे तुम

— Shabab Shahzad Khan

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