मैं ने ये कब कहा बे-सबब झूठ है

तुम को ही लग रहा है ये सब झूठ है

वो जो कहता था मुझ से उसे प्यार है
पूछता है कहा मैं ने कब झूठ है

कल सुना मैं ने अंधे को कहते हुए
कह रहा था सहर और ये शब झूठ है

वस्ल की रात हो और सज़ा हो जहाँ
एक ख़्वाहिश थी बस वो भी अब झूठ है

तू यक़ीं मान मुझ को कोई ग़म नहीं
हिज्र में कह रहे हैं जो लब झूठ है

जाने क्या हो गया है इन्हें क्यूँ ये लोग
कह रहे हैं तुम्हारा ये रब झूठ है

जानता हूँ कि वो अब मिलेगा नहीं
फिर भी दिल कह रहा है ये सब झूठ है

— ATUL SINGH

More by ATUL SINGH

Other ghazal from the same pen

See all from ATUL SINGH →

Visaal Shayari

Shers of visaal.

All Visaal Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling