Aditya
Aditya
Ghazal

बात करता है तो अक्सर वो ख़फ़ा लगता है

उस का अंदाज़ मगर सब से जुदा लगता है

वो महज़ देख ले हँस के तो दुआ लगता है
उस का अहसास मुझे लम्स-ए-सबा लगता है

उस की यादों से महक ऐसी उठा करती है
मुझ को फूलों की तरह मुझ
में खिला लगता है

बस उसे देख के ही मुझ को सुकूँ मिलता है
ये ख़बर मुझ को नहीं क्या वो मिरा लगता है

ख़ुशनुमा ऐसा कि दुश्मन भी मोहब्बत कर लें
मुझ को सचमुच वो मोहब्बत का ख़ुदा लगता है

अनकहे लफ्ज़ भी आँखों से सुने हैं उस के
वो जो कहता ही नहीं वो भी कहा लगता है

— Aditya

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