ख़ुदा फ़रिश्ते पयम्बर बशर किसी का नहीं
मुझे लिहाज़ तो सबका है डर किसी का नहीं
ये ज़िद भी है मेरी मुझ को किसी का होना है
ये शर्त भी कि उसे छोड़कर किसी का नहीं
ये चाँद किस का है जल्दी बताओ किस का है
तो क्या मैं तोड़ लूँ इस को अगर किसी का नहीं
ये कुछ ज़रूरी नहीं है वो और किसी का न हो
ज़रूर होगा मगर इस क़दर किसी का नहीं
हैं शहर में मेरे वैसे तो इतने रिश्तेदार
पर उस परी के मुहल्ले में घर किसी का नहीं
कोई तो पूछे तुम्हें इंतिज़ार किस का है
मैं सोचूँ और कहूँ सोच कर किसी का नहीं
हमें किराए पे रहना है दिल किसी का भी हो
किसी का या'नी किसी का हो हर किसी का नहीं
— Akash Gagan Anjaan















