लिख रहा हूँ मैं ऐसी ग़ज़ल दोस्तों
सुन जिसे जाए वो भी पिघल दोस्तों
ज़िंदगी जिस सहारे मैं जीता गया
याद उस को भी हैं क्या वो पल दोस्तों
कर तो लेता मुहब्बत दुबारा मगर
है नहीं कोई उस का बदल दोस्तों
एक दूजे में उलझे हुए हम ही हैं
एक दूजे की उलझन का हल दोस्तों
— Alankrat Srivastava















