नए ज़ख़्म फिर से है लाई मोहब्बत
कि जब से हुई है पराई मोहब्बत
ये लगने लगा था जला देगी सब कुछ
तमाम अब्र बरसे बुझाई मोहब्बत
ये वा'दा किया था दोबारा मिलेंगे
न आया कोई ख़त न आई मोहब्बत
मुझे ज़िंदगी इक सज़ा लग रही थी
कुरेदा ये दिल फिर जगाई मोहब्बत
इसी वज्ह से आज हैं सुर्ख़ आरिज़
लहू से है मेरे नहाई मोहब्बत
— Amaan Pathan















