क़ज़ा से खींच के लाया है मेरा प्यार मुझे
न कर सकेगा फ़ना अब कोई भी वार मुझे
जो आबले हैं मेरी रूह पर दिखाऊँ तमाम
कभी मिले जो कहीं एक ग़म गुसार मुझे
करूँ तो कैसे करूँ तुझ पे मैं यक़ीन बता
नहीं है ख़ुद पे भी जब कोई ऐतिबार मुझे
अब आस्तीन के साँपों से दूर रहना है
उसे कहो न करे फ़ोन बार बार मुझे
बचा लिया मुझे ग़र्क़ाब होने से उस ने
जुनून ए इश्क़ है लाया नदी के पार मुझे
— Amaan Pathan















