बा'द मुश्किल के जाने लगे हैं
अब कहीं ग़म ठिकाने लगे हैं
छोड़ देना था इक पल का क़िस्सा
भूलने में ज़माने लगे हैं
ऐसी आदत लगी है कि आँसू
अब ख़ुशी में भी आने लगे हैं
झूठ उन का जो पकड़ा गया है
अब वो रो के दिखाने लगे हैं
आप ही से तो रूठे थे हम क्यूँ
आप ही को मनाने लगे हैं
देख खु़द जो मुनाफ़िक़ हैं वो भी
हम को सजदे सिखाने लगे हैं
— Anas Khan















