ये किसी ने भी न पूछा किस तरह कैसे हो तुम
क्या हुआ है इस तरह किस सोच में बैठे हो तुम
ख़्वाब में ही देखता हूँ ख़ुद को उसके साथ में
और माँ कहती है बेटा देर तक सोते हो तुम
ये उदासी का सबब हम से कभी पूछा नहीं
और कहते हो बहुत कम आजकल हँसते हो तुम
एक शिकवा है मुझे वो हाल मेरा पूछती
फोन करती और कहती किस तरह कैसे हो तुम
पूछता था कल कोई 'अरहत' ये शाहाबाद है
एक हरदोई का कस्बा क्या वहीं रहते हो तुम
As you were reading Shayari by Prashant Arahat
our suggestion based on Prashant Arahat
As you were reading undefined Shayari