अब तीरगी परस्त हैं मसनद नशीन लोग
अब ये दुआ करो कि उजालों की ख़ैर हो
ऐ कातिब-ए-नसीब मेरे हक़ में कुछ तो लिख
मंज़िल नहीं तो पाँव के छालों की ख़ैर हो
पूछा है दोस्ती पे किसी ने मुझे सवाल
अब क्या कहूँ मैं छोड़िए,सालों की ख़ैर हो
— Armaan khan
अब ये दुआ करो कि उजालों की ख़ैर हो
ऐ कातिब-ए-नसीब मेरे हक़ में कुछ तो लिख
मंज़िल नहीं तो पाँव के छालों की ख़ैर हो
पूछा है दोस्ती पे किसी ने मुझे सवाल
अब क्या कहूँ मैं छोड़िए,सालों की ख़ैर हो
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