थोड़ी मिट्टी गूँथ और इक दिल बना
कुछ न कर रस्ते को ही मंज़िल बना
उसकी हालत पर मैं रोया देर तक
वो मुझे कहता था मुस्तक़बिल बना
चाय पर चर्चा चली थी 'इश्क़ पर
और फिर दोनों का अपना बिल बना
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Armaan khan
our suggestion based on Armaan khan
As you were reading Raasta Shayari Shayari