हो नहीं सकती कभी लाचार औरत
चुप कहाँ रहती ही जब हो चार औरत
मर्द ने समझा जिसे कमज़ोर हिस्सा
मर्द के ख़ातिर बनी दीवार औरत
एक औरत से हुई तख़लीक़ जिसकी
और मर्दों ने किया मिस्मार औरत
जो कभी सीता कभी राधा बनी थी
नूर सी फैली हुई घर बार औरत
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