
हैं दफ़्न दिल में जो राज़ सारे मिलो तो तुम पर अयाँ करूँँगा
तमाम चाहत तमाम उल्फ़त तमाम हसरत बयाँ करूँगा
है एक जंगल हमारे भीतर जो इक सदी से सुलग रहा है
ख़ुशी का छलका कभी जो आँसू बुझा के इस को धुआँ करूँगा
— Ashraf Ali
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