वो इक नदी जो कभी तेज़-तेज़ बहती थीवो आज रेत के मैदान सी बिछी हुई हैमैं इक दरख़्त था 'अशरफ़' किसी ज़माने मेंखिज़ां के कहरस अब ठूँठ ही बची हुई है— Ashraf Ali