किस की बारी है अब मियाँ मुझ

में
कौन लेता है हिचकियाँ मुझ
में

काश मंज़िल कोई मुझे कहता
सब को दिखती हैं सीढ़ियाँ मुझ
में

रोज़ किरदार एक मरता है
टूटी रहती हैं चूड़ियाँ मुझ
में

क़ब्र हूँ और चलती फिरती हूँ
दफ़्न कितनी हैं सिसकियाँ मुझ
में

क़ुर्बतों का सिला मिला ऐसा
रह गईं हैं तो दूरियाँ मुझ
में

मैं तो कमज़र्फ़ एक सहरा हूँ
ढूँढ़ती है वो सीपियाँ मुझ
में

गर्मियों में मुझे वो छोड़ गया
जिस ने काटी थीं सर्दियाँ मुझ
में

इश्क़ के फूल जो खिले मुझ
में
छोड़ दी हिज्र बकरियाँ मुझ
में

तुग़लक़ी हुक्म उस के आते हैं
फिर उजड़ती हैं दिल्लियाँ मुझ
में

— Ashutosh Kumar "Baagi"

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