वो 'इश्क़ मुम्किनात से आगे नहीं गया
यानी मुरासलात से आगे नहीं गया
अफ़सोस है कि इतनी तरक़्क़ी के बावुजूद
इंसान ज़ात-पात से आगे नहीं गया
बरसों के बाद आज वो मुझ सेे मिला मगर
रस्में तक़ल्लुफ़ात से आगे नहीं गया
मैंने भी इतनी दूर का सोचा नहीं था और
ये दिल भी ख़्वाहिशात से आगे नहीं गया
दोज़ख़ व ख़ुल्द ही कभी माना नहीं सो मैं
मर कर भी पुल सिरात से आगे नहीं गया
मुझको थी उस सफ़र में बितानी ये ज़िंदगी
जो चंद दिन व रात से आगे नहीं गया
जिस दर्द से हुई थी अभी ख़ुदकुशी तलब
वो दर्द काग़ज़ात से आगे नहीं गया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Abhishek Bhadauria 'Abhi'
our suggestion based on Abhishek Bhadauria 'Abhi'
As you were reading Musafir Shayari Shayari