मुझ को आदत ये अच्छी लगी आप की
ख़ूब-सूरत बहुत है हँसी आप की
सारी दुनिया में हम बस भटकते रहे
भर ना पाया कोई भी कमी आप की
लोग फिर चाहे कुछ भी कहे आप को
पर समझता हूँ मैं बेबसी आप की
मेरी किस्मत में ही लिक्खे हैं फासले
इस
में कोई भी ग़लती नहीं आप की
झूठ क्यूँ बोलूँ सच ही कहूँगा मैं तो
रात दिन याद आती रही आप की
— Daqiiq Jabaalii















