शे'र ख़ुद को ही सुनाता रहता हूँ मैं

अपनी तन्हाई मिटाता रहता हूँ मैं

बस यही इक काम तो सीखा है मैं ने
हाँ सभी के दिल दुखाता रहता हूँ मैं

शा'इरी मुझ को कहाँ आती है यारों
अपना दुख ही तो सुनाता रहता हूँ मैं

अब तो आदत पड़ गई है यार मुझ को
सब से यूँ ही धोखा खाता रहता हूँ मैं

मुझ को तो जन्नत मिलेगी मेरे यारों
माँ के पैरों को दबाता रहता हूँ मैं

दिल मेरा मिलता नहीं यारों किसी से
हाथ पर सब से मिलाता रहता हूँ मैं

मैं ज़ियादा बातें तो करता नहीं हूँ
आजकल बस ग़ज़लें गाता रहता हूँ मैं

आज फिर मिलने गया था मैं ‘अमित’ से
शाइरों के पास जाता रहता हूँ मैं

— Daqiiq Jabaalii

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