आह जब आसमान तक पहुँची
रौशनी तब मकान तक पहुँची
ज़ब्त कब तक तेरे सितम करता
अब शिकायत बयान तक पहुँची
बढ़ गया दर्द या हुआ ऐसा
ज़िन्दगी इम्तिहान तक पहुँची
दर्द के साथ में मुहब्बत थी
शा'इरी हर ज़बान तक पहुँची
आ रहा इंक़िलाब दुनिया में
शुक्र है बात कान तक पहुँची
आँख से ख़ूँ बहा है तब जा कर
शा'इरी आसमान तक पहुँची
दर्द जब जब 'धरम' ने पाया है
बेज़ुबानी ज़बान तक पहुँची
— Dharamraj deshraj















