तेरे दिल में उतर कर देखता हूँ
छुपा अपना मुक़द्दर देखता हूँ
यहाँ ईमान यारों गुमशुदा है
नहीं सोचा वो मंज़र देखता हूँ
बसा है जो हमारी धड़कनों में
वही रब सबके अंदर देखता हूँ
नहीं देखे है उन को चैन दिल को
उन्हें ख़्वाबों में ला कर देखता हूँ
जिन्हें अपना मुहाफ़िज़ मानता था
उन्हीं हाथों में पत्थर देखता हूँ
गिरी हैं दर्दो-ग़म की बिजलियाँ जो
नगर दिल का है खंडहर देखता हूँ
"धरम" कुछ पूछ बैठा था नज़र से
अब उन आँखों में उत्तर देखता हूँ
— Dharamraj deshraj















