जब रोटी के सपने आने लगते हैं
तब इन्साँ के होश ठिकाने लगते हैं
ज़ख़्म हमारे फूलों जैसे हैं यारो
दुनिया भर के ये नज़राने लगते हैं
ज़ख़्म जहाँ में जो लगते हैं बोली से
भरते-भरते उन्हें ज़माने लगते हैं
रोज़ नया दिन नए ग़मों को लाता है
हम आँखों से ख़ून बहाने लगते हैं
हमने हिम्मत का दामन जब थामा है
मंज़िल वाले सपने आने लगते हैं
जग में जब भी नाम कमाया इन्साँ ने
नज़राने ज़ख़्मों के आने लगते हैं
वो कहते हैं चाँद 'धरम' को देना है
ऐसे सपने हमें डराने लगते हैं
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