पास आकर जरा सा वो बैठे
मेरे अश'आर सुनके रो बैठे
वो मिरे ग़म में मुस्कुराये हैं
अपनी तहज़ीब यार खो बैठे
जिसने चैनो-क़रार छीना है
हम जहाँ में उसी के हो बैठे
फूल ग़ज़लों के लहलहाएंगे
शब्द काग़ज़ पे आज बो बैठे
मुस्कुराने की दी क़सम उसने
ग़म की दौलत भी आज खो बैठे
अश्क़ अपने छुपाना चाहा था
अपना दामन मगर भिगो बैठे
ग़म के दरिया को पार करना था
दिल की कश्ती "धरम"डुबो बैठे
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