लगा प्यारा इक तिल वो गालों में हरदम
उलझ कर मज़ा था वो बालों में हरदम
नहीं जानता मैं लिखूँ शे'र कैसे
था मैं मस्त अपने ख़यालों में हरदम
किताबें पढ़ी पर न समझा तू कुछ भी
रहेगा उलझ कर सवालों में हरदम
सही को सही जब न समझा सको तब
सही को लिखो तुम मिसालों में हरदम
करो वार तुम तीरगी से 'धरम' पर
रखेगा तुम्हें पर उजालों में हरदम
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